Ruaab
बचपन में बच्चों के व्यक्तित्व में जो भी उभार नज़र आता है, उसे आम भाषा में बंदरबाजी कहा जाता है। बंदर और बच्चों के स्वभाव में यही बंदरबाजी कला की अनोखी झलक पैदा करती है। इसी बंदरबाज़ी ने शरारत के रूप में लेखक को रंगमंच से जोड़ दिया। वे सातवीं कक्षा से ही रंगमंच से जुड़ गए।
वे कवि के साथ-साथ नाट्य लेखक भी बन गया। 1965 में दार्जीलिंग में संत एल्फॉन्सस हायर सेकेंड्री स्कूल कर्सियांग में पढ़ते हुए उन्होंने आकाशवाणी कर्सियांग के लिए कई रेडियो नाटक लिखे, जिनका संकलन “समर्पण का मूल्य” नाम से प्रकाशित हुआ। इसी क्रम में त्रिअंकीय नाटक “रुआब” का जन्म हुआ।
साहित्य कला-परिषद दिल्ली ने 29 मई 1987 के कार्यक्रम में इसे पुरस्कार के लिए नामित किया। यह नाटक आज भी मौजूं हैं।